Dev Kab Soyenge 2026: देवशयनी एकादशी कब की है, तिथि, शुभ मुहूर्त, पारण समय, पूजा विधि, कथा और महत्व

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हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व माना जाता है। वर्षभर आने वाली सभी एकादशियों में देवशयनी एकादशी का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस दिन से भगवान श्रीहरि विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और चातुर्मास का शुभारंभ होता है। राजस्थान, गुजरात और भारत के कई क्षेत्रों में इसे देव सोनी ग्यारसहरिशयनी एकादशीपद्मा एकादशी और आषाढ़ी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

बहुत से लोग हर वर्ष यह जानना चाहते हैं कि देव सोनी ग्यारस कब की है और इस दिन कौन-कौन से धार्मिक कार्य किए जाते हैं। वर्ष 2026 में देवशयनी एकादशी का व्रत शनिवार, 25 जुलाई को रखा जाएगा। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में चार महीने के लिए शयन करते हैं और फिर कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देवउठनी एकादशी के दिन जागते हैं।

इस पवित्र व्रत को करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है, पापों का नाश होता है और जीवन में सुख, शांति तथा समृद्धि आती है।

देव सोनी ग्यारस 2026 कब है? (Dev Kab Soyenge 2026 Kab Hai

यदि आप जानना चाहते हैं कि देव सोनी ग्यारस कब की है, तो पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में देवशयनी एकादशी शनिवार, 25 जुलाई 2026 को मनाई जाएगी।

देवशयनी एकादशी 2026 तिथि एवं मुहूर्त

  • देवशयनी एकादशी: 25 जुलाई 2026, शनिवार
  • एकादशी तिथि प्रारंभ: 24 जुलाई 2026, सुबह 09:25 बजे
  • एकादशी तिथि समाप्त: 25 जुलाई 2026, सुबह 11:40 बजे
  • व्रत पारण तिथि: 26 जुलाई 2026
  • पारण समय: सुबह 05:30 बजे से 08:20 बजे तक
  • द्वादशी समाप्ति समय: दोपहर 01:45 बजे

व्रती को द्वादशी तिथि के भीतर ही पारण करना चाहिए। शास्त्रों में निर्धारित समय पर पारण करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

देवशयनी एकादशी का धार्मिक महत्व क्यों माना जाता है?

देवशयनी एकादशी केवल एक व्रत नहीं बल्कि सनातन धर्म की एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक परंपरा है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। इसके साथ ही चातुर्मास की शुरुआत होती है।

चातुर्मास के चार महीनों को साधना, भक्ति, जप, तप और आत्मचिंतन का समय माना गया है। इस दौरान देवताओं की सक्रियता कम मानी जाती है, इसलिए विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, यज्ञोपवीत और अन्य मांगलिक कार्य सामान्यतः नहीं किए जाते।

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक देवशयनी एकादशी का व्रत करता है, उसे विशेष पुण्य प्राप्त होता है और भगवान विष्णु की कृपा उसके जीवन में बनी रहती है।

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देवशयनी एकादशी से चातुर्मास की शुरुआत क्यों होती है?

आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक का समय चातुर्मास कहलाता है। यह लगभग चार महीनों की अवधि होती है।

इन चार महीनों में:

  • विवाह और शुभ मांगलिक कार्य टाले जाते हैं।
  • साधु-संत एक स्थान पर रहकर साधना करते हैं।
  • भगवान विष्णु की विशेष पूजा की जाती है।
  • भजन, कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों का महत्व बढ़ जाता है।
  • सात्विक जीवन शैली अपनाने की सलाह दी जाती है।

चातुर्मास आत्मिक उन्नति और आध्यात्मिक अनुशासन का समय माना जाता है।

देवशयनी एकादशी की पौराणिक कथा

देवशयनी एकादशी से जुड़ी कई कथाएं पुराणों में मिलती हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कथा राजा बलि और भगवान विष्णु के वामन अवतार से जुड़ी है।

कथा के अनुसार राजा बलि अत्यंत दानी और पराक्रमी राजा थे। उन्होंने तीनों लोकों पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया था। देवताओं की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया और राजा बलि के यज्ञ में पहुंचे।

भगवान ने दान में केवल तीन पग भूमि मांगी। राजा बलि ने सहर्ष दान स्वीकार कर लिया। तब भगवान विष्णु ने विराट रूप धारण किया। पहले कदम में पृथ्वी और दिशाओं को नाप लिया तथा दूसरे कदम में स्वर्ग लोक को माप लिया। तीसरे कदम के लिए स्थान न बचने पर राजा बलि ने अपना सिर प्रस्तुत कर दिया।

राजा बलि की भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का अधिपति बना दिया। राजा बलि ने भगवान से निवेदन किया कि वे उनके साथ निवास करें। तभी से भगवान विष्णु वर्ष के एक निश्चित काल में राजा बलि के लोक में निवास करते हैं। इसी घटना को देवशयनी एकादशी से जोड़कर देखा जाता है।

शंखासुर वध से जुड़ी कथा

एक अन्य मान्यता के अनुसार आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन भगवान विष्णु ने शंखासुर नामक राक्षस का वध किया था। युद्ध के बाद भगवान विश्राम के लिए क्षीरसागर में शयन करने चले गए। तभी से इस तिथि को हरिशयनी या देवशयनी एकादशी कहा जाने लगा।

देवशयनी एकादशी व्रत का फल क्या मिलता है?

ब्रह्मवैवर्त पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथों में इस व्रत की विशेष महिमा का वर्णन मिलता है।

इस व्रत को श्रद्धा से करने पर:

  • भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।
  • जीवन के कष्ट कम होते हैं।
  • पापों का नाश होता है।
  • मानसिक शांति मिलती है।
  • आर्थिक उन्नति के मार्ग खुलते हैं।
  • परिवार में सुख और समृद्धि आती है।
  • आध्यात्मिक विकास होता है।
  • मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

विशेष रूप से जो व्यक्ति चातुर्मास के नियमों का पालन करता है, उसे अनेक यज्ञों के समान पुण्य फल प्राप्त होने की मान्यता है।

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देवशयनी एकादशी 2026 पूजा विधि

देवशयनी एकादशी के दिन पूजा पूरी श्रद्धा और नियम के साथ करनी चाहिए।

सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर तथा पूजा स्थल को साफ करके गंगाजल या पवित्र जल का छिड़काव करें।

इसके बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र को स्थापित करें। भगवान को पीले वस्त्र, पीले फूल, तुलसी दल और पंचामृत अर्पित करें।

पूजा के दौरान:

  • विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
  • ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जप करें।
  • एकादशी व्रत कथा का श्रवण करें।
  • भगवान विष्णु की आरती करें।
  • तुलसी की पूजा करें।
  • रात्रि में भजन-कीर्तन करें।

अंत में भगवान विष्णु को शयन करवाने की प्रतीकात्मक परंपरा भी निभाई जाती है।

आप इस ब्लॉग में “देवशयनी एकादशी और रुद्राक्ष का महत्व” नाम से एक नया सेक्शन जोड़ सकते हैं:

देवशयनी एकादशी और रुद्राक्ष का महत्व

देवशयनी एकादशी से चातुर्मास की शुरुआत होती है, जिसे आध्यात्मिक साधना, भक्ति और आत्म-शुद्धि का विशेष समय माना जाता है। इन चार महीनों में भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं, इसलिए भक्त अधिक से अधिक जप, तप, ध्यान और पूजा-पाठ करते हैं। ऐसे पवित्र समय में रुद्राक्ष धारण करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रुद्राक्ष भगवान शिव के आंसुओं से उत्पन्न हुआ है। यह व्यक्ति के मन को शांत रखने, नकारात्मक विचारों को कम करने और आध्यात्मिक ऊर्जा को बढ़ाने में सहायक माना जाता है। चातुर्मास के दौरान जब लोग अपनी दिनचर्या में अधिक धार्मिक अनुशासन अपनाते हैं, तब रुद्राक्ष धारण करने से मंत्र जाप और ध्यान का प्रभाव बढ़ने की मान्यता है।

विशेष रूप से 5 मुखी रुद्राक्ष को सभी आयु वर्ग के लोगों के लिए उपयुक्त माना जाता है। यह मानसिक शांति, एकाग्रता और सकारात्मकता प्रदान करने वाला माना जाता है। वहीं, जो लोग भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं, उनके लिए देवशयनी एकादशी के अवसर पर रुद्राक्ष धारण करना और उसका नियमित जाप करना लाभकारी माना जाता है।

देवशयनी एकादशी पर रुद्राक्ष धारण क्यों करें?

देवशयनी एकादशी आध्यात्मिक ऊर्जा को जागृत करने वाली तिथियों में से एक मानी जाती है। इस दिन रुद्राक्ष धारण करने के कुछ प्रमुख कारण हैं:

  • चातुर्मास की साधना को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए।
  • मन को शांत और स्थिर रखने के लिए।
  • जप, ध्यान और पूजा में एकाग्रता बढ़ाने के लिए।
  • नकारात्मक ऊर्जा से बचाव के लिए।
  • भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों की कृपा प्राप्त करने की भावना से।
  • आध्यात्मिक प्रगति और आत्मिक संतुलन के लिए।

कई श्रद्धालु देवशयनी एकादशी के दिन रुद्राक्ष माला धारण करते हैं और पूरे चातुर्मास के दौरान नियमित रूप से “ॐ नमः शिवाय” या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करते हैं। माना जाता है कि इससे साधना का फल कई गुना बढ़ जाता है और व्यक्ति को मानसिक, आध्यात्मिक तथा धार्मिक लाभ प्राप्त होते हैं।

देवशयनी एकादशी पर किन चीजों का त्याग करना चाहिए?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चातुर्मास के दौरान कुछ विशेष त्याग करने का विधान बताया गया है।

इस अवधि में:

  • मांसाहार का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • मदिरा और नशीले पदार्थों से दूर रहना चाहिए।
  • झूठ और कटु वचन से बचना चाहिए।
  • बैंगन, मूली और कुछ विशेष खाद्य पदार्थों का त्याग किया जाता है।
  • अनावश्यक क्रोध और विवाद से बचना चाहिए।
  • सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए।

कई श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार गुड़, तेल, मिठाई या अन्य प्रिय वस्तुओं का भी त्याग करते हैं।

देव सोनी ग्यारस पर क्या करें और क्या न करें?

देव सोनी ग्यारस के दिन भगवान विष्णु की पूजा, व्रत, जप और दान करना शुभ माना जाता है। जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र और धन का दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।

वहीं दूसरी ओर इस दिन क्रोध, झूठ, निंदा और तामसिक भोजन से दूर रहना चाहिए। धार्मिक कार्यों में समय बिताना अधिक लाभकारी माना जाता है।

निष्कर्ष

यदि आप सोच रहे हैं कि देव सोनी ग्यारस कब की है, तो वर्ष 2026 में यह पवित्र एकादशी 25 जुलाई, शनिवार को मनाई जाएगी। यह दिन भगवान विष्णु के योगनिद्रा में जाने और चातुर्मास की शुरुआत का प्रतीक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत को करने से जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

भगवान विष्णु के भक्तों के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर है, जब वे श्रद्धा, भक्ति और नियमों के साथ व्रत रखकर भगवान की कृपा प्राप्त कर सकते हैं।

FAQs

देव सोनी ग्यारस कब की है 2026 में?

देव सोनी ग्यारस या देवशयनी एकादशी वर्ष 2026 में शनिवार, 25 जुलाई को मनाई जाएगी।

देवशयनी एकादशी को और किन नामों से जाना जाता है?

इसे देव सोनी ग्यारस, हरिशयनी एकादशी, पद्मा एकादशी और आषाढ़ी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

देवशयनी एकादशी से क्या शुरू होता है?

इस दिन से चातुर्मास की शुरुआत होती है, जो चार महीनों तक चलता है।

क्या देवशयनी एकादशी के दौरान विवाह किए जाते हैं?

नहीं, चातुर्मास के दौरान विवाह और अन्य प्रमुख मांगलिक कार्य सामान्यतः नहीं किए जाते।

देवशयनी एकादशी का मुख्य देवता कौन है?

इस व्रत के मुख्य आराध्य भगवान श्रीहरि विष्णु हैं।

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Manish Jain (Articles: 351)

Mr. Manish Jain, is Chief Certified Gemologist (DG, GG, Graduate Pearl by GIA) at MyRatna. He is running a heritage of 60 years and he himself has a vast experience and serves huge loyal customer base across the globe. As a certified gemologist he has a great knowledge of gems and helps in giving resolution to current questions/problems and in achieving the desired effects by wearing the right Gemstone/ Rudraksha to his clients.
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